न जुबां थी, न आवाज… आंखों में था अपनों से बिछड़ने का दर्द
गोद में दो साल की मासूम को लिए भटकती रही सुमन

कनखल पुलिस ने चार दिन बाद मिलाया परिवार से
हरिद्वार (चंद्रशेखर जोशी)। कांवड़ मेले की भीड़ में अपनों से बिछड़ने का दर्द शायद वही समझ सकता है, जिसके पास अपनी बात कहने के लिए शब्द भी न हों। शंकराचार्य चौक पर दो साल की मासूम बेटी को सीने से लगाए रो रही सुमन की आंखें मदद की गुहार लगा रही थीं। वह न सुन सकती थी, न बोल सकती थी और न ही लिखकर अपना पता बता सकती थी। पति भीड़ में कहां बिछड़ गया, घर कहां है—यह बताने का उसके पास सिर्फ इशारों का सहारा था।

कनखल पुलिस ने उसकी खामोशी को समझा और इंसानियत का हाथ थाम लिया। एक अगस्त को शंकराचार्य चौक पर मिली सुमन और उसकी बेटी को पुलिस ने सुरक्षित अपने संरक्षण में लिया। महिला से जानकारी जुटाने की तमाम कोशिशों के बावजूद जब कोई पता नहीं चल सका तो पुलिस ने उसे और उसकी दो वर्षीय बेटी को वन स्टॉप सेंटर, गैस प्लांट रानीपुर में सुरक्षित पहुंचाया। इसके साथ ही सोशल मीडिया और व्हाट्सऐप ग्रुपों के माध्यम से परिजनों की तलाश शुरू कर दी गई। चार दिन तक पुलिस की कोशिशें जारी रहीं। आखिरकार मंगलवार को सुमन के ससुर राजकुमार कनखल थाने पहुंचे। उन्होंने महिला की पहचान सुमन और बच्ची की पहचान शिवानी के रूप में की। उन्होंने बताया कि सुमन का पति करन उर्फ कर्मा भी अभी घर नहीं पहुंचा है। वह भी बोल नहीं पाता और कांवड़ लेकर पैदल घर लौटेगा। अपनों को सामने देखते ही सुमन की आंखें छलक उठीं। उसके पास खुशी जाहिर करने के लिए शब्द नहीं थे। नम आंखों और हाथ जोड़कर किए गए इशारों ने पुलिस को दिल से धन्यवाद कह दिया। उस मां की आंखों में लौट आई खुशी ने कनखल पुलिस की पूरी कहानी बयां कर दी। कांवड़ मेले की भीड़ और अफरा-तफरी के बीच एक बेसहारा मां और मासूम बच्ची को सुरक्षित रखना और फिर चार दिन में उसके परिवार तक पहुंचाना कनखल पुलिस की संवेदनशीलता और मानवीयता की मिसाल बन गया। पुलिस की इस पहल की क्षेत्रवासियों ने भी जमकर सराहना की।
पुलिस टीम में थाना प्रभारी देवेन्द्र सिंह रावत, वरिष्ठ उपनिरीक्षक अनुज सिंह, हेड कांस्टेबल संजय धनाई, कांस्टेबल विजयपाल, महिला कांस्टेबल प्रियंका और सुमन भंडारी शामिल रहे।



