राजनीति समाज की दासी है और राजनेता समाज के सेवक है

पिछले 100 वर्षों की राजनीति ने उत्तराखंड का शोषण किया।
पिछले कई दशकों में विभिन्न राजनीतिक
पौड़ी से श्याम सिंह
विचारधाराओं और दलों ने उत्तराखंड की राजनीति की, लेकिन क्या उन्होंने हिमालयी क्षेत्रों के लिए आवश्यक संवैधानिक सुरक्षा पर गंभीरता से विचार किया?
जब लद्दाख, हिमाचल प्रदेश और अन्य पर्वतीय क्षेत्रों के लिए विशेष संवैधानिक एवं प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर चर्चा होती रही, तब उत्तराखंड राज्य बनने से पहले या राज्य गठन के समय ऐसी सुरक्षा की मांग क्यों नहीं उठाई गई?
आज जब 5th Schedule (पाँचवीं अनुसूची) और अन्य संवैधानिक प्रावधानों की चर्चा हो रही है, तो यह प्रश्न स्वाभाविक है कि यह मांग पहले क्यों नहीं की गई? यदि यह व्यवस्था उत्तराखंड के जल, जंगल, जमीन, भाषा, संस्कृति और स्थानीय अधिकारों की रक्षा में सहायक हो सकती थी, तो इसे राज्य निर्माण के समय ही प्राथमिकता क्यों नहीं मिली?
दुर्भाग्य से, जब इस विषय पर कई वरिष्ठ नेताओं से प्रश्न पूछा जाता है, तो उनका उत्तर होता है “हमें उस समय इसकी जानकारी नहीं थी।”
यदि ऐसा था, तो यह केवल किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक नेतृत्व और नीति-निर्माण की एक गंभीर कमी को दर्शाता है।
आज सत्ता में बैठे दल हों या विपक्ष में बैठे दल यदि उत्तराखंड के मूलभूत संवैधानिक, सामाजिक और सांस्कृतिक प्रश्नों का समाधान नहीं हो पा रहा है, तो समाज को स्वयं आगे आकर इन विषयों पर गंभीर संवाद करना होगा। लोकतंत्र में राजनीतिक मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन उत्तराखंड के दीर्घकालिक हित किसी एक दल या विचारधारा से ऊपर हैं।
समय की आवश्यकता है कि उत्तराखंड का समाज केवल चुनावी राजनीति तक सीमित न रहे, बल्कि सामाजिक संगठन, जनजागरूकता, संवैधानिक समझ और सामुदायिक एकजुटता को मजबूत करे। जब समाज जागरूक और संगठित होगा, तभी राजनीति भी जनहित के मुद्दों को प्राथमिकता देने के लिए बाध्य होगी।
राजनीति समाज के लिए होनी चाहिए, समाज राजनीति के लिए नहीं। संगठित समाज, सशक्त राष्ट्र।



