यूक्रेन पर भारत के स्वतंत्र रुख का रूस ने किया स्वागत

यूक्रेन पर भारत के स्वतंत्र रुख का रूस ने किया स्वागत

यूक्रेन पर हमले की आशंका के बीच अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी समेत कई देशों ने रूस पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए हैं। यूक्रेन के दो प्रांत  लुहांस्क- डोनेत्स्क को स्वतंत्र देश घोषित करके रूस ने पश्चिमी देशों को ऐसा करने के लिए मजबूर कर दिया है। 

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने एक आदेश जारी कर अमेरिकी लोगों के डोनेत्सक और लुहांस्क में सभी नए निवेश, व्यापार और वित्त पोषण पर रोक लगा दी है। यूरोपीय संघ में शामिल 27 देशों ने रूस के राजनेताओं और उद्योगपतियों के पाबंदी की बात कही। वहीं ब्रिटेन ने पांच रूसी बैंक और तीन अरबपतियों पर पाबंदी लगा दी है। उनकी संपत्ति भी फ्रीज की जा रही है।ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन ने भी रूस के खिलाफ कई पाबंदियों का एलान भी किया है।

वहीं जापान भी इस मुद्दे पर पश्चिमी देशों के साथ आ गया है। दूसरी तरफ जर्मनी ने रूस से आ रही नॉर्ड स्ट्रीम-2 गैस पाइपलाइन परियोजना बंद करने का फैसला किया है। इन पाबंदियों से रूस पूरी तरह बौखला गया है और उसने चेतावनी दी है कि प्रतिबंधों से वैश्विक वित्तीय और ऊर्जा बाजारों को नुकसान होगा। रूस ने कहा है कि अमेरिकियों को इसके परिणाम पूरी तरह से महसूस होंगे।

इसका सीधा मतलब है ऊर्जा क्षेत्र में अस्थिरता के बादल मंडराएंगे। यह पाबंदियां वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें बढ़ाने के साथ-साथ महंगाई को भी ऊंचाई पर ले जा सकती है। यूरोप लगभग एक तिहाई गैस के लिए रूस पर निर्भर रहता है। यूरोपीय संघ को करीब 40 फीसदी और ब्रिटेन को करीब तीन फीसदी प्राकृतिक गैस की आपूर्ति रूस से होती है। यूरोप को चिंता है कि अगर रूस गैस और तेल की आपूर्ति बंद कर देगा, तो इससे ऊर्जा की कीमतें बढ़ेंगी।

अब पाबंदियां लगने के बाद रूस यूरोप में गैस की आपूर्ति में कटौती कर सकता है, जिसका सीधा असर तेल की कीमतों पर पडे़गा। यूरोप और जापान को चिंता इस बात की है रूस ऊर्जा और चिपमेकिंग आपूर्ति को प्रतिबंधित कर सकता है। वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने यह स्वीकार किया कि इस संकट से गैसोलीन की कीमतें अधिक हो सकती हैं। 

अमेरिका पर क्या है खतरा?
अमेरिका को चिंता साइबर अटैक को लेकर भी है। अमेरिका ने अपने व्यवसाय को संभावित साइबर हमलों के लिए तैयार रहने की चेतावनी दी है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के विनाशकारी ‘हाइब्रिड युद्ध’ और साइबर हमले के ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए अमेरिकी सुरक्षा अधिकारियों को डर है कि वह यूक्रेन पर संभावित हमले के मद्देनजर लगी पाबंदियों के कारण अमेरिका पर साइबर अटैक कर सकता है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक होमलैंड सिक्योरिटी विभाग ने 23 जनवरी, 2022 को एक खुफिया बुलेटिन जारी किया, जिसमें चेतावनी दी गई थी कि रूस वेबसाइटों से लेकर पावर ग्रिड जैसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को बाधित करने के लिए कई साइबर अटैक कर सकता है। विभाग ने यह रिपोर्ट कानून प्रवर्तन एजेंसियों, राज्य सरकारों, स्थानीय सरकारों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा ऑपरेटरों को भेजा है।

कथित तौर पर दिसंबर 2020 में हुए सोलरविंड्स हमले में कई अमेरिकी सरकारी एजेंसियों और निजी व्यवसायों के कंप्यूटर सिस्टम तक रूस की पहुंच हो गई थी। एफबीआई ने मार्च 2018 में रूसी हैकर्स पर अमेरिकी ऊर्जा और बुनियादी ढांचे के नेटवर्क में घुसपैठ करने का भी आरोप लगाया था। हालांकि अमेरिका दुनिया की सबसे सक्षम साइबर शक्ति है और उसके पास रूसी साइबर आक्रमण से निपटने का 20 सालों का अनुभव भी है।

यूक्रेन पर कर चुका है साइबर अटैक
रूस कथित तौर पर 16 फरवरी को यूक्रेन पर साइबर अटैक कर चुका है। सरकारी एजेंसियों और बड़े बैंकों पर साइबर हमले की वजह से कम से कम 10 वेबसाइट्स ने काम करना बंद कर दिया था। अमेरिका ने इन हमलों के लिए रूस को जिम्मेदार ठहराया। कहा गया कि ऐसा ही हमला जनवरी में भी यूक्रेन पर हुआ था। तब 70 वेबसाइट्स ने काम करना बंद कर दिया था।

माना जा रहा है कि रूस पर लगाए गए कई आर्थिक प्रतिबंध से रूस की अर्थव्यवस्था के लिए एक झटका जैसा होगा। इसमें कोई शक नहीं है कि प्रतिबंधों का असर हो सकता है, लेकिन कई वजहों से रूस कुछ समय तक इन पाबंदियों को झेल सकता है। रूस, चीन और दूसरे मित्र देशों की मदद से पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों का असर घटा सकता है।

रिपोर्टस के मुताबिक पुतिन पश्चिमी देशों की तुलना में अधिक समय तक प्रतिबंधों का सामना कर सकते हैं। इस साल जनवरी तक रूस के पास विदेशी मुद्रा और सोने में अंतरराष्ट्रीय भंडार 630 बिलियन डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर था। यह दुनिया में इस तरह के भंडार की चौथी सबसे बड़ी राशि है और रूस इसका उपयोग कुछ समय के लिए अपनी मुद्रा रूबल को आगे बढ़ाने में कर सकता है। 

रूस की तैयारी क्या?
रिपोट्स बताते हैं कि अगर यह स्विफ्ट ( एक ग्लोबल मैसेजिंग सर्विस जिसका 200 देशों में हजारों वित्तीय संस्थाएं इस्तेमाल करती हैं) से कट भी जाता है तो इसके लिए मास्को पहले ही अंतरराष्ट्रीय भुगतान की अपनी प्रणाली बनाने के लिए प्रारंभिक कदम उठा चुका है। 

कोरिओलिस टेक्नोलॉजीज के मुख्य कार्यकारी डॉ रेबेका हार्डिंग के एक बयान के मुताबिक ‘रूस असल में लगभग एक वैकल्पिक वित्तीय प्रणाली का निर्माण कर रहा है ताकि वह पश्चिम द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के कुछ झटके झेल सके। लेकिन इस सब में थोड़े समय के लिए कुछ परेशानी तो जरूर होगी।’

चीन के और करीब जा सकता है रूस
यूक्रेन संकट के बीच रूस अमेरिका के कट्टर प्रतिद्वंदी चीन के करीब भी जा सकता है। चीन के ग्लोबल टाइम्स अखबार का दावा है कि रूस और चीन के बीच रिश्ते सबसे करीबी दौर में हैं।

इस महीने की शुरुआत में जब चीन में शीतकालीन ओलंपिक का उद्घाटन हुआ तो इस मौके पर शी जिनपिंग के निमंत्रण पर व्लादीमिर पुतिन भी बीजिंग पहुंचे थे। ऐसे में माना जा रहा है कि चीन रूस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों का असर कम करने में उसकी मदद कर सकता है। 2014 में जब क्रीमिया संकट आया उस समय भी रूस  चीन के करीब गया था। रूस उस समय भी पूरी दुनिया से प्रतिबंधों की मार झेल रहा था, उस वक्त भी चीन ने उसे आर्थिक और कूटनीतिक मदद दी थी।

दूसरी तरफ हंगरी, इटली और ऑस्ट्रिया जैसे देशों के रूस से करीबी रिश्ते हैं। माना जाता है कि रूस यदि यूक्रेन पर हमला भी कर देता है तो इससे वे रूस पर प्रतिबंध नहीं लगाना चाहेंगे। इससे रूस को अलग-थलग करना पश्चिमी देशों के लिए मुश्किल हो सकता है।

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