उत्तराखंड में भूस्खलन के मलबे से बने बांध नई बात नहीं है। यहां इनका लंबा इतिहास रहा है। बांध बनते और टूटते रहे, जो राज्य के लिए अब भी उतनी ही बड़ी चिंता है। आईआईटी रुड़की के वैज्ञानिकों के ताजा शोध में यह चिंताजनक सच सामने आया है। यह शोध रिपोर्ट इसी साल जनवरी में अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित हुई है।
जब भूस्खलन किसी नदी को अवरुद्ध करता है तो वहां पानी जमा होकर एक झील बन जाती है। यह झील जब टूटती है तो भूस्खलन झील विस्फोट बाढ़ का कारण बनती है, जो नीचे बसे इलाकों में भारी तबाही मचा सकती है। हाल ही में स्यानाचट्टी और धराली में इसका प्रत्यक्ष रूप देखने को मिल रहा है।
चमोली सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्र
रिपोर्ट में बताया गया है कि संकरी घाटियां, कमजोर चट्टानें और भूकंपीय सक्रियता उत्तराखंड को भूस्खलन और भूस्खलन से बने बांधों के लिए अत्यधिक संवेदनशील बनाती है। खासकर अलकनंदा नदी घाटी और चमोली जिला सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में हैं। बताया गया है कि 1893 में बना गोहना ताल 76 साल बाद 1970 में टूटने से हरिद्वार तक बाढ़ आई थी।
वर्ष 1857 से 2018 के बीच उत्तराखंड में कई भूस्खलन बांध दर्ज किए गए हैं। अगस्त में सबसे अधिक भूस्खलन बांध बनने की घटनाएं होती हैं। 28 प्रतिशत घटनाएं मलबे के भूस्खलन से, 24 प्रतिशत पत्थर गिरने से और 20 प्रतिशत मलबे के बहाव से हुई हैं। अधिकतर घटनाएं मानसून के महीनों (जुलाई-अगस्त-सितंबर) में हुई हैं, जब भारी बारिश ने भूस्खलन को बढ़ावा दिया। चमोली, रुद्रप्रयाग और उत्तरकाशी जिले सबसे अधिक प्रभावित रहे हैं।