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प्रदेश की राजनीति में यह संसदीय क्षेत्र अहम,: यहां लगातार दो बार कोई नहीं जीता, वर्ष 1989 में पहली बार खिला था कमल

धर्मशाला ।   कांगड़ा संसदीय क्षेत्र का हर हलका हर चुनाव में सत्ता के दरवाजे खोलता और बंद करता रहा है। खासकर विधानसभा चुनाव में तो सत्ता का रास्ता यहीं से शुरू होता है हालांकि लोकसभा चुनाव के मामले में भले ही प्रदेश की चारों सीटों का केंद्र में कोई असर न पड़ता हो पर प्रदेश की राजनीति में यह संसदीय क्षेत्र इतना अहम रहा है कि बड़े-बड़े नेताओं को जमीन भी दिखाई है।

इसी संसदीय क्षेत्र के हिस्से यानी चंबा में बड़ा विरोधाभास है। इस जिले की किस्मत ऐसी है कि केंद्र ने भी इसे राष्ट्रस्तर पर पिछड़ा जिला घोषित किया है। चंबा के मुकाबले विकास में कांगड़ा जिला काफी आगे है। इस संसदीय क्षेत्र पर कांग्रेस का वर्चस्व रहा है। आजाद भारत के पहले लोकसभा चुनाव 1952 से 1977 तक देश क्या प्रदेश में भी कांग्रेस का एकछत्र राज रहा है।

आपातकाल के बाद हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के इस तिलिस्म को इंदिरा विरोधी लहर ने तोड़ा। आपातकाल के बाद 1977 के लोकसभा चुनाव में यहां की सभी सीटों पर कांग्रेस विरोधी दलों के संयुक्त मोर्चे भारतीय लोकदल के प्रत्याशी विजयी हुए। इस दौरान कांगड़ा से कांग्रेस सांसद रहे विक्रम चंद महाजन को लोकदल के दुर्गाचंद ने मात दी लेकिन केंद्र सरकार लगभग ढाई वर्ष तक ही चल पाई। 1980 के चुनाव में फिर से इस संसदीय क्षेत्र की सीट कांग्रेस  के विक्रम चंद महाजन के नाम रही। इसके बाद 1984 के चुनाव में भी कांग्रेस का जलवा कायम रहा और चंद्रेश कुमारी कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में विजय हुई।

About एच बी संवाददाता

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