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01_12_2016-mamtabanerjee650

आज तक किसी भी सरकार ने सीबीआई को नहीं दिया कोई कानूनी आधार

श्चिम बंगाल में केंद्र और राज्य सरकार के बीच चिट फंड घोटाले की जांच को लेकर उत्पन्न तनातनी दुर्भाग्यपूर्ण है। इससे संवैधानिक संकट खड़ा हो गया। सवाल यह है कि इस तरह की स्थिति बनी क्यों? हमें देखना होगा कि सीबीआइ, राज्य सरकार और उसके पुलिस कमिश्नर ने अपनी भूमिका कैसे निभाई? भूमिका कितनी वैधानिक थी और कहां तक उचित थी?

पहले तो सीबीआइ ने पुलिस कमिश्नर के खिलाफ ऐसे समय में कार्रवाई शुरू की जब नए सीबीआइ डायरेक्टर की घोषणा हो चुकी थी। मेरा मानना है कि जब नए सीबीआइ डायरेक्टर का चयन हो चुका था, तो किसी मामले में कदम उठाने से पहले नागेश्वर राव जो सीबीआइ के अंतरिम डायरेक्टर थे। उन्हें इस तरह का अहम फैसला नहीं लेना चाहिए था। यह जिम्मेदारी सही उत्तराधिकारी के लिए छोड़ देनी चाहिए थी। नागेश्वर राव के बारे में कहा जाता है कि उन्हें सीबीआइ में नहीं होना चाहिए था।

कहा यह भी जाता है कि आलोक वर्मा उन्हें सीबीआइ में नहीं रखना चाहते थे, परंतु उनका प्रभाव ऐसा था कि डायरेक्टर को बर्दाश्त करना पड़ा। मुझे संदेह है कि नागेश्वर राव सरकार के प्रति निष्ठा का प्रदर्शन करना चाहते थे। सीबीआइ ने जिस तरह से जल्दबाजी में कोलकाता के पुलिस कमिश्नर के यहां रेड डाली वह उचित नहीं था। सीबीआइ टीम जब गई थी तो इस तरह का माहौल बनाया गया कि लगा पुलिस कमिश्नर भगोड़े हो गए हैं। बाद में राज्य सरकार द्वारा आधिकारिक तौर पर कहा भी गया कि वह भगोड़े नहीं है। एक साथ सीबीआइ के चालीस लोग गए इसकी क्या आवश्यकता थी? पांच-छह लोग ही बहुत थे। सीबीआइ ने गलत काम किया परंतु गलत काम का जवाब गलत तरीके से देना सही बात नहीं है। सीबीआइ के अधिकारियों के साथ जिस तरह से धक्का-मुक्की हुई और कुछ लोगों को थाने तक ले जाया गया और वहां उनके कागज देखे गए। यह बंगाल पुलिस की ओर से ज्यादती हुई।

बंगाल की मुख्यमंत्री को मामले को सुलझाना चाहिए था। वह उलटे धरने पर बैठ गईं। जिस तरह से ममता बनर्जी धरने पर बैठी यह लोगों को नाटक ही लगा। ममता बनर्जी को चाहिए था कि वह गृहमंत्री को फोन करके कहतीं कि अपने आदमियों को वापस बुलाइये। उन्हें गरिमा में रहते हुए परिपक्वता दिखानी चाहिए थी। पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार भी धरने पर बैठे। वे आल इंडिया सर्विसेस कंडेक्ट रूल से बंधे हैं। यह बिलकुल गलत था कि वह नेताओं के साथ धरने पर बैठ गए। आज अधिकारियों का राजनीतिकरण हो गया है। यह दुखद है।

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