श्रीनगर। ललदेद अस्पताल के जच्चा-बच्चा वार्ड में गुलशना बेगम अपनी नवजात जुड़वा बच्चियों को देख फूली नहीं समा रही हैं। वह बार-बार भारतीय फौज का शुक्रिया अदा कर रही जिसे खुदा ने फरिश्ता बनाकर भेज दिया था। गुलशना ने बताया कि अगर फौजी नहीं आते तो न मैं जिंदा होती और न मेरी यह लाडलियां।

बांडीपोर के एक गांव की गुलशना को शनिवार को उस समय घर में प्रसव पीड़ा शुरू हुई। जब पूरे इलाके में चारों तरफ तीन से चार फुट बर्फ की मोटी चादर बिछी हुई थी। डॉक्टर की मदद चाहिए थी। समय बीत रहा था। हालत बिगड़ रही थी। उसके पति को कुछ नहीं सूझा तो उसे अपने गांव से करीब पांच किलोमीटर दूर स्थित सैन्य शिविर का नंबर याद आया।

गुलशना के पति ने सैन्य शिविर में फोन लगाया तो फोन कंपनी कमांडर ने उठाया। सैन्याधिकारी नेे जैसे ही पूछा कौन हैं। गुलशना के पति ने भर्राये गले से बोला कि अगर मेरी पत्नी यूं ही घर में तड़पती रही तो सिर्फ वही नहीं उसके पेट में पल रहा शिशु भी मर जाएगा। फोन सुनने वाले अधिकारी ने उसे दिलासा देते हुए कहा कि बस कुछ और देर इंतजार करो, तुम्हारे पास पहुंच रहे हैं।

एक सैन्य डॉक्टर और आवश्यक साजो-सामान के साथ जवानों का दल तुरंत मदद के लिए शिविर से निकल पड़ा। तीन से चार फीट बर्फ के बीच करीब सवा दो किलोमीटर पैदल चलते हुए जवान गुलशना के घर पहुंचे। सैन्य डॉक्टर ने उसका मुआयना किया और अपने साथ आए सैन्यकर्मियों को कहा कि वह उसे तुरंत अस्पताल पहुंचाए।